मनुष्य में मनुष्यत्व को जगाने में यदि कोई सार्वभौम साधन है, तो वह सर्वहितकारी भाव से वेदलक्षणा गौमाता की सेवा और पर्यावरण रक्षा...... पुज्या गौमाता तथा उसके अखिल गौवंश के संरक्षण, सम्पोषण, पर्यावरण संरक्षण हेतु वृक्षारोपण करना एवं विश्व शांति स्थापित करने वाली सनातन संस्कृति का प्रचार करना, यही एक पूर्णतया सर्व हितकारी प्रवृति है, जो निष्काम भाव से वेदलक्षणा गौवंश की सेवा को प्रचारित करेगी।
मुझे प्राप्त वर्तमान शरीर का जन्म दिनांक 23 सितंबर 1950 में ग्राम- सिरसूँ , तहसील- मकराना, जिला- नागौर राजस्थान में हुआ। बी.एस.एफ (B.S.F.) में कमांडेड और बाद में रिलायंस एनर्जी में मैनेजर के पद पर कार्यरत रहा। वर्ष २००५ में परम पूज्य दाता भगवान स्वामी राम ज्ञान तीर्थ जी महाराज दात्ताजी के दर्शन के बाद आध्यात्म में रुचि जगी और फिर सदा के लिए दाता जी के हो गये। फिर वर्ष २०२२ में गंगा किनारे गोपालाचार्य स्वामी गोपालानन्द जी सरस्वती जी के सानिध्य मे संन्यास ग्रहण कर दाताजी की प्रधान पीठ शीतल आश्रम की सारी जिम्मेदारियों को सम्भालने का कार्य वर्तमान में जारी हैं।
दादा गुरु देव परम पूज्य दाता भगवान और गुरुदेव भगवान परम पूज्य गोपालाचार्य स्वामी गोपालानन्द सरस्वती जी महाराज भगवान के सानिध्य मैं जगत जननी भगवती, गौ माता के दिव्य एवं ईश्वरीय स्वरूप की महिमा का श्रवण, चिन्तन व मनन तथा रामचरित मानस श्रीमद्भगवत गीता व वेदांत का अध्ययन। मेरे प्राप्त शरीर का जन्म राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के रायला गाँव में एक माली (वैश्य)किशान परिवार में हुआ कक्षा 8 तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद पढ़ाई में मन नहीं लग पाया परिवार का वातावरण आध्यात्मिक होने के कारण पूजा पाठ दर्शन सेवा और दया का भाव बाल्यकाल से ही था अतः भगवान से मिलन की इच्छा प्रबल होती चली गई दुष्ट लोगो द्वारा जीव हत्या पर मन बचपन से ही व्यथित रहता था और बड़ा होकर शक्ति शाली बनकर दुष्टों से सामना करने का मन बनने लगा और लव कुश व्यायाम शाला (अखाड़े) में प्रवेश कर कुश्ती का अभ्यास करने लगा एक बार एक निराश्रित गो माता को आदर पूर्वक घर ले आया और गोमती नाम रख कर सेवा करने लगा अकाल की स्थिति में मिल में काम कर के गोमाता के लिए चारे का प्रबंध किया
पूज्य गुरुदेव भगवान के माध्यम से चल रही विश्व की सबसे पहली लम्बी व सबसे बड़ी पदयात्रा ""31 वर्षीय गो पर्यावरण एंव अध्यात्म चेतना पदयात्रा"" का आगमन रायला ग्राम में हुआ। ईश्वर की अद्भुत कृपा हुई और ऐसे त्यागी तपस्वी एवं परम गौभक्त गुरु का सानिध्य प्राप्त हुआ। परम पूज्य गुरूदेव भगवान के मुखारविंद से गो महिमा कथा को सुनकर मन प्रभावित हुआ प्रारंभ में घर वालो का विरोध रहा पर कालांतर मे सब सहज हो गया और घर छोड़ कर सदा सदा के लिए गुरुदेव भगवान की शरण में आ गया
जीवन के कही अनुभवों व घटनाओं से संसार से मोह भंग होने लगा और गौमाता व राष्ट्र की पीड़ा से मन पीड़ित होने लगा।आदरणीय राजीव दीक्षित जी व परम पूज्य गोऋषि श्री दत्तशरणानंदजी महाराज जी से प्रेरित होकर गौ-सेवा के पुनीत कार्य में तन-मन से लग गया। पूज्य पथमेड़ा महाराज जी व गौमाता की कृपा से 10 साल तक श्री पथमेड़ा गोधाम की विभिन्न गौशालाओं में प्रत्यक्ष गौसेवा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ
बाल्यावस्था से ही शरीर के माता-पिता के द्वारा अध्यात्म और सत्य धर्म के मार्ग पर चलने का मार्गदर्शन और गो -सेवा करने के संस्कारप्राप्त हुए । सनातन धर्म के धर्मग्रंथो में ऐसा निर्देश मिलता है कि भगवती गौमाता द्वारा प्रदत गो गव्य जीवन के समस्त पापों का नाश करते हैं। बाल्यकाल से ही शरीर को भगवती गौ माता के दुग्ध दही, घृत, छाछ का सेवन करने का आनंद लाभ मिला।
गौ-सेवा की बात करें, तो बचपन में एसा कभी-कभी एहसास होता था कि गौमाता से हमारा कोई पूर्व जीवन का रिश्ता है, l परन्तु उस रिश्ते को परिभाषित करना मुश्किल था!समय व्यतीत होने के पश्चात्, ईश्वर कृपा से जीवन में बदलाव आया और परम पूज्य गुरुदेव भगवान का सानिध्य प्राप्त हुआ
बाल्यकाल से ही मंदिर जाना, पूजा पाठ करना, सत्संग श्रवण करने में रुचि रही। कोई भी जीव मेरे कारण से दु:खी न हो व सद्मार्ग पर चलने के शुद्ध भाव ने मुझे परम पूज्य ग्वाल संत श्री गोपालाचार्य स्वामी गोपालानंद जी सरस्वती जी महाराज जी गुरुदेव से मिलवाया। गुरुदेव भगवान की कृपा से वर्ष 2008 से ही भगवती गौ माता की सेवा करने का अवसर प्राप्त हुआ, उससे पूर्व गोमाता की महिमा इतनी विराट है, यह ज्ञान नहीं था।
वर्तमान शरीर का जन्म 21 june 1992 को सूरत, गुजरात में प्रजापति परिवार में हुआ। तथा बाल्यकाल गलवा, रायपुर, भीलवाड़ा, राजस्थान में बीता। परिवार की पृष्ठभूमि कृषि प्रधान होने कारण पढ़ाई पर विशेष ध्यान नहीं दे पाए। किसानों के गांव में उस समय बेटियों की पढ़ाई लिखाई पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाना तथा विद्यालय की गांव से 3 km की दूरी होना, शिक्षा से दूरियों का कारण बना, हालांकि इस बात का मलाल आज तक हृदय में बना हुआ है, परंतु प्रसन्नता की बात यह है की शिक्षा से दूरियाँ रही पर गौमाता की कृपा से गौमाता से सदैव नजदीकियाँ रही। ज्यादा पढ़ने के बाद मैं किसी की गुलामी या किसी की के अधीनता में नहीं रहूँ, इस हेतु गोमाता ने इस प्रकार की कृपा की। गो-सेवा का काम महज 10 वर्ष की आयु में ईश्वर कृपा से मेरे पास आ गया था। परन्तु पशुवत् भाव होने कारण सुकून नहीं मिला।
मुझे प्राप्त वर्तमान शरीर का जन्म दिनांक 07 जून 1995 में राजस्थान के बडोदिया,बांसवाडा,के ब्राह्मण शिक्षक दपंती के यहाँ हुआ। शरीर के माता पिता और भाई राजकीय सेवा मे शिक्षक होने से परिवारिक पृष्ठभूमि शिक्षा जगत की रही इस कारण बचपन से ही शिक्षा का वातावरण प्राप्त हुआ। B.A,b.ed की शिक्षा प्राप्ती के क्षेत्र में जीवन आगे बढ़ रहा था।
मुझे प्राप्त वर्तमान शरीर का जन्म तिथि -18 नवंबर 1998 में झालावाड़ जिले के मनोहरथाना तहसील के बल्देवपुरा में एक क्षत्रिय शिक्षक परिवार में हुआ। परिवार में आध्यात्मिक वातावरण दर्शन बचपन से ही था। पूजा पाठ करना, व्रत-अनुष्ठान करना, मंदिर जाना, कथा श्रवण करना, यह बचपन से ही माता-पिता के द्वारा दिए संस्कारों सिखाया गया। बाल्यकाल से ही भगवती गौमाता की सेवा करने का पुण्यमयी शुभ अवसर प्राप्त हुआ। भगवती गौ माता जी ने मुझ पर कृपा करके अपनी सेवा प्रदान की
वैसे तो बचपन से ही हृदय में परमात्मा की भक्ति का बीजाकुंर हो गया था, परंतु बात गौ-सेवा की करें, तो प्रारंभिक जीवन में किसी भी प्रकार की गौ-सेवा नहीं थी। यहाँ तक की भगवती गौ माता की सेवा किस प्रकार की जाती है, इस सन्दर्भ में कोई जानकारी नहीं थी। या यूं कहें कि गौमाता ने अपनी सेवा से अछूता और वास्तविक परिचय से अनभिज्ञ ही रखा, परंतु कुछ समय व्यतीत होने के पश्चात्, ईश्वर कृपा से जीवन में बदलाव आया और परम पूज्य गुरुदेव भगवान का सानिध्य प्राप्त हुआ
प्राप्त वर्तमान शरीर का जन्म दिनांक 8 दिसम्बर1996 में टोंक जिले की दूनी तहसील में मेहरा(केवट कश्यप) परिवार में हुआ। परम पूज्य गुरुदेव भगवान के माध्यम से चल रही विश्व की सबसे पहली लम्बी व सबसे बड़ी पदयात्रा ""31 वर्षीय गो पर्यावरण एंव अध्यात्म चेतना पदयात्रा"" का वर्ष 2013 में आगमन हमारे ग्राम दूनी में हुआ। बस स्टैंड पर संकटमोचन हनुमान मंदिर के सामने यात्रा स्वागत इत्यादि होने के पश्चात् पदयात्रा के प्रणेता परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान ग्वाल संत श्री गोपालाचार्य स्वामी गोपालानंद जी सरस्वती जी महाराज जी के मुखारविंद से गौ महिमा सत्संग का आयोजन हुआ। परम पुज्य गुरुदेव भगवान मुखारविंद से गौमाता की करूण व्यथा को सुनकर मन में ऐसा भाव आया कि वर्तमान समय में गौ माता की रक्षा एवं उनकी सेवा की महती आवश्यकता है
मुझे प्राप्त वर्तमान शरीर का जन्म दिनांक 29 नवम्बर 2001 में हरियाणा, हिसार के लाडवी गांव के किसान परिवार में हुआ। शरीर के माता-पिता पुलिस में सेवारत रहते हुए भी कृषि कार्य किया करते थे, इसलिए बाल्यकाल में ऐसा दृश्य देखा कि बैलों से खेती होती है। बैल भगवान बहुत शांत होते हैं और कभी-कभी तो घर से बैलगाड़ी पर जोत कर छोड़ते तो अपने आप खेत पर चले जाते हैं और खेत से बैलगाड़ी पर सामान भरकर छोड़ते तो अपने आप घर पर आ जाते। गांव के नंदी भगवान भी रहते उनको सब आदर भाव से रखते थे। गोलोक गमन के बाद भावपूर्वक समाधि देते थे। परिवार में आध्यात्मिक वातावरण होने से प्रारंभ से ही सामान्य व्रत, पूजा- पाठ, रात्रि जागरण इत्यादि होता ही रहता था
प्राप्त वर्तमान शरीर का जन्म दिनांक 1 नवंबर 1989 में महाराष्ट्र के रवलगाव के सामान्य किसान परिवार में हुआ। परिवार की पृष्ठभूमि कृषि की होने के कारण मेरा जीवन बचपन में आध्यात्मिक नहीं रहा। माता-पिता एवं अन्य परिवारजनों द्वारा कृषि कार्य करने में ही रुचि रखने के कारण मेरा रुख लौकिक शिक्षा जगत की तरफ नहीं हुआ और अध्ययन में रुचि न होने के कारण मैं शिक्षा जगत में बहुत लंबी यात्रा नहीं कर पाया। कक्षा 9वीं तक अध्ययन किया
मुझे प्राप्त वर्तमान शरीर का जन्म दिनांक 3 मार्च 2011 में चित्तौड़गढ़ जिले के बेगू तहसील में एक वैष्णव परिवार में हुआ। परिवार की पृष्ठभूमि धार्मिक होने के कारण बचपन से ही आध्यात्मिक वातावरण प्राप्त हुआ। माता-पिता और दादाजी के साथ कथा श्रवण करना, मंदिर जाना और बाल्यकाल में दादाजी के साथ गौ सेवा का भी सुअवसर प्राप्त हुआ।
प्राप्त वर्तमान शरीर का जन्म गुजरात के एक छोटे से गांव भडवेल में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। मेरे पिता कृषि कार्य किया करते है। मेरी प्राथमिक शिक्षा गांव मे ही हुई और संस्कृत की शिक्षा संत श्री संद्यागिरी बापु संस्कृत वेद विद्यालय (समाखियारी-कच्छ) से भगवतगिरी बापु के सानिध्य मे हुई। जब 2011 मे नंदगांव (पथमेड़ा) में सुरभि यज्ञ प्रारंभ हुआ, तब प्रथम बार सुरभि यज्ञ करने का अवसर मिला
मुझे प्राप्त वर्तमान शरीर का जन्म झारखंड के धनबाद जिले में एक निम्न वर्गीय गरीब परिवार में हुआ। बचपन से ही गरीबी से वास्ता रहा। जैसे तैसे करके मां-पिताजी ने स्कूल और कालेज की पढ़ाई कराई। निम्न वर्गीय गरीब परिवार होने के कारण आध्यात्म और धर्म-कर्म के कार्यों से दुर दुर तक कोई संबंध नहीं रहा। हां, ईश्वर कृपा से भक्ति और सेवा भाव के बीज बचपन से ही मेरे अंदर विद्यमान थे।
प्राप्त वर्तमान शरीर का जन्म एक सामान्य किसान परिवार में हुआ। परिवार की पृष्ठभूमि में धार्मिकता का अभाव था, इस कारण ईश्वर में श्रद्धा नहीं थी जीवन नास्तिकता से युक्त था। बात अगर गो सेवा की करें तो प्रारंभिक जीवन में किसी भी प्रकार की गो-सेवा नहीं थी, यहाँ तक कि गोमाता की सेवा क्यों व कैसे की जाती है इसका भी ज्ञान नहीं था। मैं कक्षा दसवीं में अध्ययनरत था, उस समय परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान ग्वाल संतश्री गोपालाचार्य स्वामी गोपालानंद जी सरस्वती जी महाराज जी के के श्रीमुख से प्रथम बार गो कृपा कथा श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
मुझे प्राप्त वर्तमान शरीर का जन्म 24 सितंबर 1999 में राजस्थान के धौलपुर जिले के गांव पथैना में क्षत्रिय परिवार में हुआ। परिवार की पृष्ठभूमि आध्यात्मिक होने के कारण ठाकुर जी की सेवा, आरती, पूजा इत्यादि धार्मिक कार्यों को बाल्यकाल से ही करने का सौभाग्य मिला। इसके कारण बचपन से ही भगवान के प्रति आस्था, विश्वास, श्रद्धा धीरे-धीरे बढ़ने लगी, लेकिन बात यदि गो-सेवा की करें,तो दूर-दूर तक गोमाता के प्रति कोई मातृत्व भाव नहीं था, क्योंकि भगवती गौ माता ने मुझे अपनी सेवा से अनभिज्ञ रखा। कभी गौमाता की महिमा को जानने का अवसर नहीं मिला।
लौकिक जीवन में बिहार सरकार में टंकण विभाग में कार्यरत रहा। सेवा निवृति के पश्चात् गो सेवा का पुनीत कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ। सोला भागवत विद्यापीठ में परम पूज्य गुरूदेव भगवान के मुखारविंद से प्रसारित गो कृपा कथा से प्रभावित होकर गो-सेवा की और झुकाव हुआ परन्तु क्रियान्वन नहीं हो पाया। दो वर्ष व्यतीत होने के बाद टेलीविजन के माध्यम से ज्ञात हुआ कि श्री गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा द्वारा संचालित कामधेनु गौ अभयारण्य, सालरिया, आगर-मालवा, मध्य प्रदेश, में परम पूज्य गुरूदेव भगवान के मुखारविंद से एक वर्षीय वेदलक्षणा गो आराधना महामहोत्सव चल रहा हैं।
प्राप्त वर्तमान शरीर का जन्म दिनांक 5 मार्च 2000 को राजस्थान के बूंदी जिले के सामान्य किसान परिवार में हुआ। बाल्यावस्था से ही अपने पिताजी को गौ सेवा करते देख मेरे हृदय में गौमाता की सेवा का बीजाकुंर अंकुरित हुआ। पूर्व जन्म के पुण्यकर्मों के प्रभाव से बचपन गौमाताओं के मध्य ही बीता। गौमाताजी की सेवा का सौभाग्य माँ ने कृपा करके प्रारम्भ से ही प्रदान किया।
प्राप्त वर्तमान शरीर का जन्म दिनांक 14 जुलाई 2007 चित्तौड़गढ़ जिले के छोटे से गांव में वैष्णव परिवार में हुआ। परिवार की पृष्ठभूमि धार्मिक होने के कारण बचपन से ही आध्यात्मिक वातावरण प्राप्त हुआ। माता-पिता और दादाजी के साथ कथा श्रवण करना, मंदिर जाना और बाल्यकाल में दादाजी के साथ गौ सेवा का भी सुअवसर प्राप्त हुआ। गंगा, यमुना, सरस्वती, स्वरुपा तीन गौमाता की उपस्थिति घर पर थी।
प्राप्त वर्तमान शरीर का जन्म दिनांक 15 अप्रैल 2001 बूंदी जिले छोटे से गांव ओवन में जांगिड़ ब्राह्मण परिवार में हुआ। बाल्यावस्था से जीवन में संघर्ष रहा। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण मेरे माता-पिता स्थान बदल बदल कर निवास करते थे आर्थिक परेशानियों के चलते जीवन में आध्यात्मिक और धार्मिक वातावरण नहीं मिला। परंतु समय एक जैसा नहीं रहता है। जीवन सुख एवं दु:ख का संयोग है।