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कुरीतियों एवं बुराइयों को कान से सुने हृदय में न उतारे*- स्वामी ज्ञानानंद तीर्थ,जगदगुरू शंकराचार्य भानपुरा पीठ


सुसनेर। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव द्वारा मध्य प्रदेश के निराश्रित गोवंश के संरक्षण हेतु सम्पूर्ण मध्यप्रदेश में भारतीय नूतन संवत 2081 से घोषित "गोवंश रक्षा वर्ष" के तहत जनपद पंचायत सुसनेर की समीपस्थ ननोरा, श्यामपुरा, सेमली व सालरिया ग्राम पंचायत की सीमा पर मध्यप्रदेश शासन द्वारा स्थापित एवं श्रीगोधाम महातीर्थ पथमेड़ा द्वारा संचालित विश्व के प्रथम श्री कामधेनु गो अभयारण्य मालवा में चल रहें एक वर्षीय वेदलक्षणा गो आराधना महामहोत्सव के 353 वें दिवस पर स्वामी गोपालानंद सरस्वती महाराज ने बताया कि जहां जहां भी संतो के चरण पड़ते है वह स्थान उन संतो के चरणारविन्दुओं से और पवित्र हो जाता है और भानपुरा पीठ के शंकराचार्य भगवान के चरण पड़ते से यह स्थान और सिद्ध हो गया है ।

स्वामीजी सहित अभ्यारण्य में विराजित संतो ने शंकराचार्य भगवान ज्ञानानंद जी तीर्थ की चरण पादुका पूजन कर उनका आशीर्वाद लिया।

*353 वे दिवस पर जगदगुरू शंकराचार्य भगवान भानपुरा पीठ स्वामी ज्ञानानंद जी तीर्थ ने अपने आशीर्वचन में बताया कि दत्तात्रेय जी ने अपने समीप गोमाता और स्वान को रखकर हमें यह संदेश दिया हे कि जीवन में हमें किसी न किसी से कुछ न कुछ सीखते रहना चाहिए
धरती माता से हमे सहशीलता एवं परोपकारिता सीखनी चाहिए गोमाता का गौमूत्र सबसे पवित्र होता हे,गोमाता भूसा खा कर भी हमें अमृतमय दुग्ध देती है अर्थात बिना कुछ लिए गोमाता हमें बहुत कुछ दे देती है।
शंकराचार्य भगवान ने बताया कि प्रकृति ने सबके लिए प्रसाद की व्यवस्था की है परंतु इंसान सबके हिस्से का खा गया रहा है और गोमाता के लिए दृष्टि ने जो घास फूस बनाया है उसे भी आज मानव जलाकर नष्ट कर रहा है,जिससे असंख्य जीवों की हत्या के साथ साथ पर्यावरण को नुकसान हो रहा है, जबकि भगवती गोमाता उन तृणों को खाकर हमें अमृत रूपी दूध एवं गोबर गोमूत्र के रूप में पर्यावरण संरक्षण एवं हमारे स्वास्थ्य रक्षा करती है इसलिए पर्यावरण संरक्षण में भगवती गोमाता की भूमिका महत्वपूर्ण है ।
 शंकराचार्य ने धरतीमाता एवं गोमाता दोनों की महिमा बताते हुए बताया कि धरती माता हमें आश्रय देती है और गोमाता हमें पोषण के साथ साथ वात्सल्य भी देती है । समुद्र मंथन में जहर अमृत के साथ हमें कामधेनु गोमाता मिली है । जहर को तो भगवान शंकर ने अपने गले में गटक हमें यह संदेश दिया कि किसी भी बुरी बात को न तो निगले न ही उसे उगले बल्कि उसे अपने गले में ही रखे यानि कोई भी कुरीति हो उसे कान से सुन तो ले लेकिन उसे दिल में न उतारे भगवान शंकर ने हलाहल विष को अपने गले में रखकर किसी को कष्ट नहीं होने दिया और वे नीलकंठ कहलाएं।

*353 वें दिवस पर पूज्य देवानंद जी महाराज
सहित श्री गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा के कार्यकारी अधिकारी आलोक सिंहल,प्रबंध न्यासी अंबालाल सुथार,क्षेत्रीय निदेशक ब्रह्मदत्त व्यास, भूर सिंह राजपुरोहित एवं इंदौर महानगर गो सेवा भारती के वरिष्ठ कार्यकर्ता कैलाश खंडेलवाल ,निलेश गंगराड़े महामंत्री, दुर्गा प्रसाद शर्मा ,नंदकिशोर शर्मा,दिनेश दाते,महेश , प्रमोद, रत्ना , रूपाली भारती प्रमोद मौलिक प्रमोद खंडेलवाल आदि अतिथि उपस्थित रहे ।

*353 वे दिवस पर चुनरी यात्रा बिहार,झारखंड राजस्थान एवं मध्यप्रदेश से*

एक वर्षीय गोकृपा कथा के 353 वें दिवस पर चुनरी यात्रा बिहार,झारखंड राजस्थान एवं मध्यप्रदेश के इंदौर महानगर गो सेवा भारती के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की और से सम्पूर्ण विश्व के जन कल्याण के लिए गाजे बाजे के साथ भगवती गोमाता के लिए चुनरी लेकर पधारे और कथा मंच पर विराजित भगवती गोमाता को चुनरी ओढ़ाई एवं गोमाता का पूजन कर स्वामी गोपालानंद सरस्वती महाराज से आशीर्वाद लिया और अंत में सभी ने गो पूजन करके यज्ञशाला की परिक्रमा एवं गोष्ठ में गोसेवा करके सभी ने गोव्रती महाप्रसाद ग्रहण किया।